आइए जानते हैं गुरु रजनीश (Osho – 1931 - 1990) के बारे में

आइए जानते हैं गुरु रजनीश (Osho – 1931 - 1990) के बारे में
आइए जानते हैं गुरु रजनीश (Osho – 1931 - 1990) के बारे में

भगवान श्री रजनीश कौन थे?

कॉलेज से स्नातक होने और ज्ञान प्राप्त करने का दावा करने के बाद, 1970 में, भगवान श्री रजनीश ने "डायनामिक मेडिटेशन" की प्रथा शुरू की और एक आध्यात्मिक शिक्षक बन गए और महत्वपूर्ण चीजों का अनुसरण करना शुरू कर दिया। जब उनकी विवादास्पद शिक्षाओं ने उन्हें भारतीय अधिकारियों के साथ संघर्ष में डाल दिया, तो रजनीश और उनके अनुयायी ओरेगन क्षेत्र में भाग गए, जहां उन्होंने एक समुदाय स्थापित करने का प्रयास किया। हालांकि, स्थानीय समुदाय के साथ संघर्ष की वजह से रजनीश और उनके समूह के सदस्यों ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपराध का सहारा लिया, और 1985 में, रजनीश को धोखाधड़ी से आप्रवास करने पर गिरफ्तार कर लिया गया। दोषी मानने के बाद, उन्हें भारत भेज दिया गया। 19 जनवरी, 1990 को भारत के पुणे में उनका निधन हो गया।

श्री रजनीश (Osho) का इतिहास -

भगवान श्री रजनीश का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को कुचवाड़ा, भारत में हुआ था। वह अपने दादा-दादी के साथ कम उम्र में और फिर अपने माता-पिता के साथ रहने लगे थे। वे एक बुद्धिमान थे, लेकिन व्यवाहर से विद्रोही। 1951 में, रजनीश हाई स्कूल से ग्रेडुएट होने के बाद जबलपुर में हितकारिणी कॉलेज में जाना शुरू कर दिया। लेकिन प्रोफेसर के साथ विवादास्पद व्यवहार के कारण उन्हें मजबूरी में डीएन जैन कॉलेज में स्थानांतरित करना पड़ा।

1953 में, आत्मा की खोज और ध्यान करने के लिए अपनी पढ़ाई से एक साल तक दूर रहने के बाद, रजनीश ने दावा किया कि उन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। हालाँकि, उन्होंने स्कूल में वापसी की, और फिलॉसोफी में बैचलर डिग्री के साथ ग्रेडुएट होने के बाद, उन्होंने सागर विश्वविद्यालय में फिलॉसोफी, यानी दर्शनशास्त्र में मास्टर की पढ़ाई की।

1957 में अपनी ग्रेडुएट स्तर की पढ़ाई के बाद, रजनीश ने रायपुर संस्कृत कॉलेज में फिलॉसोफी के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में एक पद स्वीकार किया, लेकिन उनके कट्टरपंथी विचारों की वजह से उनके संस्थान प्रशासन के साथ संबंध बिगड़ गए और उन्हें कही और काम की तलाश के लिए मजबूर होना पड़ा और अंततः जबलपुर के विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए।

आध्यात्मिक नेतृत्व

जबलपुर विश्वविद्यालय में टीचिंग के साथ, रजनीश ने आध्यात्मिकता के बारे में अपने अपरंपरागत और विवादास्पद विचारों को फैलाते हुए पूरे भारत की यात्रा की। उनकी शिक्षाओं में यह धारणा थी कि सेक्स "अतिचेतना" को प्राप्त करने का पहला कदम है। 1964 तक, उन्होंने मेडिटेशन शिविरों का संचालन करना शुरू किया और अनुयायियों की भर्ती की, और दो साल बाद उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं के प्रसार पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी प्रोफेसरशिप से इस्तीफा दे दिया। इस प्रक्रिया में, वह जातिच्युत मनुष्य बन गए और खुद को "सेक्स गुरु" उपनाम दे डाला।

1970 में, रजनीश ने "डायनामिक मेडिटेशन" प्रथा की शुरुआत की, इसपर जोर देना शुरू किया और कहा कि यह प्रथा लोगों को दिव्यता का अनुभव करने में सक्षम बनाती है। पश्चिमी युवाओं की खोज शुरू हुई और पुणे में अपने आश्रम में रहने के लिए लुभाया, और रजनीश के भक्त शिष्य बन गए, जिन्हें ‘सन्यासिन’ कहा जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में, रजनीश के अनुयायियों ने नए भारतीय नाम अपनाएं, नारंगी और लाल कपड़े पहने, और समूह सत्रों में भाग लेना शुरू किया, जिसमें कभी-कभी हिंसा और यौन संकीर्णता शामिल थी।

1970 के दशक के अंत तक, छह एकड़ का आश्रम इतना भीड़भाड़ वाला था कि रजनीश ने उससे छुटकारा पाने के लिए एक नई जगह की तलाश की। हालाँकि, रजनीश का आंदोलन इतना विवादास्पद हो गया था कि स्थानीय सरकार ने उनके सामने कई बाधाएं लाकर रख दी। 1980 में तनाव देखने को मिला, जब एक हिंदू कट्टरपंथी ने रजनीश की हत्या का प्रयास किया।

सरकारी अधिकारियों और पारंपरिक धार्मिक समूहों के दबाव के कारण, 1981 में रजनीश अपने 2 हजार शिष्यों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका भाग गए, और मध्य ओरेगन में 100 वर्ग मील के खेत में बस गए, यहां जाकर उन्होंने अपना नाम रेंचो रजनीश रखा। वहां रजनीश और संन्यासियों ने रजनीशपुरम नाम से अपना शहर बनाना शुरू किया। निराश पड़ोसियों ने पुलिस को रजनीशपुरम को बंद करने को कहा, उन्होंने दावा किया कि इससे ओरेगन के भूमि उपयोग कानूनों का उल्लंघन हुआ है, लेकिन रजनीश अदालत में विजयी रहे और धार्मिक सम्प्रदाय का विस्तार करना जारी रखा।

अपराध और गिरफ्तारी -

जैसे-जैसे समुदाय और स्थानीय सरकारी समुदाय के बीच तनाव बढ़ता गया, रजनीश और उनके अनुयायियों ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और अधिक कठोर उपायों की ओर रुख किया जैसे 1984 में हत्या, वायरटैपिंग, मतदाता धोखाधड़ी, आगजनी और अधिक हिस्सों में साल्मोनेला जहर को फैलाना, जिसमें 700 से अधिक लोग प्रभावित हुए थे।

कई समुदाय नेता अपने अपराधों के लिए पकड़े जाने से बचने के लिए भाग खड़े हुए, 1985 में, पुलिस ने रजनीश को गिरफ्तार कर लिया, जो खुद अप्रवास धोखधड़ी के आरोपों से बचने के लिए संयुक्त राज्य भागने की कोशिश कर रहा था। ट्रायल के दौरान रजनीश को अप्रवास धोखधड़ी का दोषी पाया गया, यह एक मात्र तरीका था जहां वो भारत लौट सकता था।

बाद में जीवन और विरासत –

दोषी ठहराए जाने के बाद, रजनीश भारत लौट आए, जहां उन्होंने पाया कि उनके अनुयायियों की संख्या में काफी कमी आई है। आने वाले महीनों में, उन्होंने अपने आश्रम को फिर से स्थापित करने के लिए एक जगह की खोज की। 1986 में फिर से भारत लौटने से पहले उन्हें कई देशों में प्रवेश से वंचित कर दिया गया था।

अगले कुछ वर्षों के दौरान, उन्होंने अपनी सीख को लोगों तक पहुंचाना जारी रखा और खुद का नाम बदलकर ओशो रख लिया। कुछ ही दिनों में उनके स्वास्थ्य में गिरावट देखी जाने लगी। 19 जनवरी, 1990 को, पुणे, भारत में उनके कुछ समुदाय बचे थे, लेकिन इस दौरान दिल की विफलता के कारण उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद, समुदाय को ओशो संस्थान का नाम दिया गया था, और बाद में नाम बदलकर ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिज़ॉर्ट रख दिया गया, जिसे वर्तमान में प्रति वर्ष 200,000 विज़िटर्स द्वारा आकर्षित करने का अनुमान है। ओशो के अनुयायियों ने भी ओशो ध्यान केंद्रों में से एक से अपने विश्वासों को फैलाना जारी रखा है जो उन्होंने दुनिया भर के प्रमुख शहरों में खोले हैं।

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