क्या है अशोकाष्टमी व्रत और इसका महत्त्व ?
व्रत विधि

क्या है अशोकाष्टमी व्रत और इसका महत्त्व ?

Dharm Raftaar

अशोकाष्टमी व्रत चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को रखा जाता है। अगर इस दिन पुनर्वसु नक्षत्र हो तो अशोकाष्टमी व्रत और शुभ माना जाता है। इस दिन अशोक वृक्ष से जुड़ा पूजा का विधान बताया गया है। अशोक कलिका प्राशन की प्रधानता होती है जिसकी वजह से इसे अशोकाष्टमी कहा जाता है। अशोका अष्टमी व्रत के बारे में गरुड़ पुराण में भगवान ब्रह्मा जी द्वारा बताया गया है, इस वजह से भी इसकी बेहद ही विशिष्ठ महत्ता है।

अशोकाष्टमी व्रत विधि और महत्व -

इस दिन अशोक वृक्ष की पूजा करने व्रत रखने के साथ-साथ जल में अशोक के आठ पत्ते डालकर जल को पीने से व्यक्ति के सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस दिन सुबह स्नान आदि करके अशोक वृक्ष का पूजन करें। फिर अशोक वृक्ष की आठ कलियां लें और निम्नलिखित मंत्र को पढ़ने के साथ-साथ जल पान करें :

त्वामशोक हराभीष्ट मधुमाससमुद्भव। पिबामि शोकसन्तप्तो मामशोकं सदा कुरु।।

ऐसी मान्यताएं हैं कि अशोक के वृक्ष के बीचे बैठना बेहद अच्छा माना जाता है जीवन में शोक की स्थिति पैदा नहीं होती। साथ ही अशोक के पेड़ के नीचे बैठने से स्त्रियों को समस्त कष्टों से छुटकारा मिलता है। अशोक वृक्ष को एक औषधि के रूप में देखा जाता है। संस्कृत में इसे हेम पुष्प व ताम्रपपल्लव कहते हैं।

अशोकाष्टमी की व्रत कथा -

एक बार ब्रह्माजी ने बताया कि चैत्र के महीने में पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त अशोक अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस दिन अशोक वृक्ष की आठ कलियों का जल पान जो भी व्यक्ति करता है उसे किसी भी प्रकार का दुख नहीं होता। अशोकाष्टमी के महत्व से संबंधित कहानियां आपको रामायण में भी देखने को मिल जाएगी, जिसमें रावण की लंका में सीता जी अक्सर अशोक के वृक्ष के नीचे ही बैठा करती थी और वहीं उन्हें हनुमान जी मिले थे। जिन्होंने सीता को राम का संदेश पहुंचाया था।