गुरू अंगद देव

गुरु अंगद साहिब का जन्म 31 मार्च 1504 को हुआ था। गुरु अंगद साहिब सिख धर्म के दूसरे गुरु हैं। इन्हें पंजाबी भाषा गुरुमुखी का जनक माना जाता है। 

गुरु अंगद साहिब के कार्य (Early Life of Guru Angad Sahib in Hindi)

अंगद साहिब ने गुरु नानक के लेखन को संगृहीत करने के साथ-साथ उनका प्रचार करना भी शुरू किया। साथ ही उन्होंने अपने अनुभवों से कई गीतों का लेखन किया और लोगों तक उन्हें पहुंचाने के लिए गुरुमुखी लिपि की रचना भी की।

गुरुमुखी क्या है (What is Gurumukhi)

गुरुमुखी का मतलब होता है गुरु के मुख से निकली हुई वाणी। गुरुमुखी वह लिपि है जिसमें "गुरुग्रंथ साहिब" लिखी गई है। गुरुमुखी की खासियत यह है कि यह बेहद आसान और स्पष्ट उच्चारण से युक्त है। इसकी मदद से लोग गुरु नानक जी की शिक्षाओं और उनके भजनों को समझ सके। 

गुरु अंगद देव जी के कार्य (Works of Guru Angad Dev ji)

गुरु अंगद साहिब के नेतृत्व में ही लंगर की व्यवस्था का व्यापक प्रचार हुआ। गुरु अंगद जी का असली नाम भाई लहना जी था। एक बार उन्होंने गुरु नानक जी का एक गीत एक सिख को गाते हुए सुन लिया। इसके बाद उन्होंने गुरु नानक देव जी से मिलने का मन बनाया। कहते हैं कि गुरु नानक से पहली मुलाकात में ही गुरु अंगद जी का चरित्र तब्दील हो गया और वह सिख धर्म में परिवर्तित होकर कतारपुर में रहने लगे। इन्होंने ही गुरुमुखी की रचना की और गुरु नानक देव की जीवनी लिखी थी। 

गुरु और सिख धर्म के प्रति उनकी आस्था को देखकर गुरु नानक ने उन्हें दूसरे नानक की उपाधि और गुरु अंगद का नाम दिया। कहा जाता है कि गुरु बनने के लिए नानक जी ने इनकी सात परिक्षाएं ली थी। गुरु नानक जी की मृत्यु के बाद गुरु अंगद जी ने उनके उपदेशों को आगे बढ़ाने का काम किया। गुरु अंगद जी का निधन 29 मार्च 1552 को हुआ।

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