श्री वासुपूज्य जी

भगवान वासुपूज्यनाथ जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर हैं। प्रभु वासुपूज्य का जन्म चम्पापुरी में इक्ष्वाकु वंश के महान राजा वासुपूज्य की पत्नी जया देवी के गर्भ से फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शतभिषा नक्षत्र में हुआ था। इनके शरीर का वर्ण लाल और चिह्न भैंसा था।

प्रभु वासुपूज्यनाथ जी का जीवन परिचय (Jain Tirthankara Lord Vasupujyanath Ji- Biography in Hindi)

वसुपूज्य जन्म से ही वैरागी थे, इसलिए इन्होने वैवाहिक प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया। राजपद से इंकार कर, साधारण जीवन व्यतीत किया। फाल्गुन कृष्ण अमावस्या को प्रभु वासुपूज्यनाथ जी ने प्रवज्या में प्रवेश किया। एक माह की छदमस्थ साधना द्वारा माघ शुक्ल द्वितीय को ‘केवली’ उपाधि प्राप्त की। मनोहर उद्यान में भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी के दिन चौरानवे मुनियों के साथ भगवान वासुपूज्यनाथ जी को मोक्ष प्राप्त हुआ था।

प्रभु वासुपूज्यनाथ जी हिंसा के निंदक थे। उनका मानना था कि अपने स्वार्थ के लिए अनेकों मूक पशुओं की बलि चढ़ाना अज्ञानपूर्ण एवं क्रूरतापूर्ण कार्य है। यह प्रतिबन्ध होना चाहिए। ईश्वर इस हिंसक कार्य से खुश नहीं होते क्योंकि ईश्वर तो प्रेम प्रवाह से प्रसन्न होते हैं, न कि रक्त प्रवाह से।

प्रभु वासुपूज्यनाथ का धर्म परिवार (Family of Prabhu Vasupujyanath)

प्रभु के धर्म परिवार में प्रमुख 62 गणधर थे। 72 हजार श्रमण, 1 लाख श्रमणियां, 2 लाख 15 हजार श्रावक एवं 4 लाख 36 हजार श्राविकाएँ थीं।

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