श्री ऋषभदेव जी

भगवान ऋषभदेव जी जैन धर्म के पहले तीर्थंकर हैं। ऋषभदेव जी ने जैन धर्म के उत्थान के लिए कई कार्य किए। कहा जाता है कि इनके पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा। ऋषभदेव जी का वर्णन हिन्दू पुराणों में भी पाया जाता है। कई जगह इनका वर्णन भगवान विष्णु के अवतार के रूप में किया गया है। जैन धर्म के अन्य सभी तीर्थंकरों ने इन्हीं के जीवन का अनुसरण किया।

ऋषभदेव जी का जीवन परिचय (Details of First Jain Trithankar- Rishabhdev Ji in Hindi)

चैत्र कृष्ण नवमी को जन्मे भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के पहले तीर्थंकर के रूप में प्रसिद्ध हैं। अयोध्या के महाराज नाभिराय व उनकी पत्नी महारानी मरूदेवी को प्रभु के माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रभु का वर्ण सुवर्ण और चिह्न वृषभ है। युवावस्था में ऋषभदेव का विवाह सहजाता सुमंगला व सुनन्दा नामक कन्या से हुआ। कालक्रम से प्रभु ऋषभदेव के 101 पुत्र और पुत्री हुए। प्रजा की प्रार्थना पर प्रभु राज्यभार संभाला व प्रजा की पुत्रवत सेवा की। कर्मयुग के प्रवर्तन में ऋषभदेव ने पुत्र पुत्रियों का सहयोग लिया और उनको विभिन्न दायित्व सौंपे।

ऋषभदेव का ताप, ज्ञान और मोक्ष

ऋषभदेव को नृत्य को देखते हुए वैराग्य हुआ। भगवान ने भरत का राज्याभिषेक करते हुए इस पृथ्वी को ‘भारत’ का नाम दिया। ऋषभदेव ‘सुदर्शना’ नामक पालकी पर सवार होकर ‘सिद्धार्थक’ वन में पहुंचे, जहां वटवृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन प्रभु को केवल उपाधि प्राप्त हुई। माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन कैलाश पर्वत पर भगवान ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया।

भगवान के चिह्न का महत्त्व (Importance of Symbol)

गऊ वंश का स्वामी वृषभ, भगवान ऋषभदेव का चिह्न है। वृषभ भगवान शिव का भी वाहन है। शास्त्रों में इसका वर्णन भार वहन, कठोर परिश्रम तथा अत्यन्त बलवान प्राणी के रूप में किया गया है। ऋषभ या वृषभ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो कार्यभार हमें मिला है उसे पूरी मेहनत से सम्पूर्ण करना चाहिए।

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