अरण्य द्वादशी व्रत

अरण्य द्वादशी व्रत मार्गशीर्ष मास की शुक्ल एकादशी को रखा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की जनार्दन रूप में पूजा करने का विशेष विधान है। भविष्यपुराण के अनुसार स्वयं सीता जी ने इस व्रत को श्रीराम के कहने पर वनवास के दौरान रखा था तथा ऋषि पत्नियों को प्रसन्न किया था। यह व्रत हर माह की शुक्ल एकादशी को रखा जाता है।
 

अरण्य द्वादशी व्रत विधि (Aranya Duvadashi Vrat Vidhi)

अरण्य द्वादशी व्रत में शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रातः उठकर स्नान करना चाहिए। पूजा स्थल पर भगवान विष्णु जी की प्रतिमा रख उनकी भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिए। पूजा करते हुए भगवान को फूल, फल, धूप, दीप, गंध आदि चढ़ाना चाहिए।
 
पूरे दिन उपवास रखने के बाद रात को जागरण कीर्तन आदि करवाना चाहिए तथा दूसरे दिन स्नान करने के पश्चात ब्राह्मणों को फल और भोजन करवा कर उन्हें क्षमता अनुसार दान देना चाहिए। अंत में स्वयं भोजन करना चाहिए। इसी प्रकार एक वर्ष तक यह व्रत रखना चाहिए।
 
 

अरण्य द्वादशी व्रत फल (Benefits of Aranya Duvadashi Vrat)

भविष्यपुराण के अनुसार जो भी पूरे विधि-विधान से अरण्य द्वादशी का व्रत करता है वह परिवार समेत भगवान के समीप श्वेत दीप में निवास करता है। इस व्रत की महिमा से व्रती के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं तथा अंत में वह सभी सांसारिक सुखों को भोगने के बाद मोक्ष प्राप्त करता है। यदि कोई स्त्री भी इस व्रत को करती है तो वह भी संसार के सभी सुखों का उपभोग करके पति लोक को जाती है।

हिन्दू व्रत विधियां 2017

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