प्राणि-सेवा ही परमात्मा की सेवा है

दूसरों का उपकार करना ही पुण्य है,
दूसरों   को   सताना   ही   पाप  है 
 
उपरोक्त पंक्तियों ही हिन्दू धर्म में सेवा का मूल आधार है। हिन्दू धर्म में मानवता के विषय को बेहद महत्वपूर्ण और सर्वोपरि माना जाता है। मानवता की सेवा के संदर्भ में अगर हिन्दू धर्म के दर्शन और प्रमुख तत्व की बात करें ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्हें देखकर यह समझ आता है कि हिन्दू धर्म का मुख्य जोर प्राणी और मानवता की सेवा कर भगवान को पाने की होती है। आइए समझे ऐसे ही कुछ बिन्दुओं को जो हिन्दूओं के प्राणी सेवा के भाव को जाहिर करते हैं। 


 
"नर ही नारायण"  
 हिन्दू धर्म में एक कहावत है कि "नर ही नारायण होता है" अर्थात मनुष्य में ही भगवान मौजूद है। पुराणों में बताया गया है कि मनुष्य के हाथों में आगे के हिस्से में (अंगुलियों की तरफ) लक्ष्मी जी, मध्य भाग में सरस्वती और निचले भाग में नारायण यानि भगवान विष्णु का वास होता है। इस तरह मनुष्य का शरीर साक्षात मंदिर की तरह ही है और मंदिर की पूजा की जाती है। 
 


दान और भंडारा 
हिन्दू धर्म में हर पूजा और अनुष्ठान के बाद दान देने और भोज कराने का विधान है। दान देने और भंडारा कराने के पीछे मानसिकता समाज के पिछड़े वर्ग की सेवा करना होता है। 
 


मनुष्य के साथ जानवरों आदि की सेवा 
हिन्दू धर्म में पेड़-पौधों और जानवरों को भी पूजनीय बना कर उनकी रक्षा और सेवा सुनिश्चित की गई है। गाय को यहां माता का दर्जा दिया जाता है वहीं कौओं जैसे पक्षियों को श्राद्ध अर्पित किया जाता है। 
 
हिन्दू धर्म में मानवता के महत्व को दर्शाने के लिए उपरोक्त उदाहरण कम लेकिन बेहद महत्वपूर्ण हैं। इस धर्म की विचारधारा और लय पूरी तरह से मानवता को सबसे ऊपर रखती हैं। 

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