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हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं मेंHindutva Ka Vaas Sanskar mein

हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में (Hindutva Ka Vaas Sanskar mein)

हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हिन्दू धर्म संस्कारों और परंपराओं को सबसे ऊपर रखता है। हिन्दू धर्म में मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे कई संस्कारों से गुजरना पड़ता है। सभी संस्कार हिन्दू धर्म की परंपरा का ही हिस्सा हैं। 


क्यों जरूरत है संस्कारों और परंपराओं की 
हिन्दू धर्म के अनुसार ऋषि मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों और परंपराओं का निर्माण किया है। इन परंपराओं और संस्कारों का वर्णन वेदों में भी किया गया है। हिन्दू धर्म में मुख्य सोलह संस्कार की बात की गई हैं। परंपराएं तो हिन्दू समाज में हर कदम और क्षण मनुष्य के साथ रहती हैं। 


हिन्दू संस्कार 
विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोड़ा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, विद्यारंभ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है। कुछ अहम संस्कार निम्न हैं: 


गर्भाधान: मान्यता है कि उत्तम संतान की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था। 
पुंसवन: पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भाधान करना उचित माना गया है।
सीमन्तोन्नयन: सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने और गर्भ में पल रहे बच्चें की रक्षा के लिए इस संस्कार को अहम माना जाता है। 
जातकर्म:  जन्म के समय किए जाने वाले संस्कार को जातकर्म कहते हैं। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है ताकि बालक को बल, बुद्धि और स्वस्थ जीवन मिल सके। 
नामकरण: नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है।  नामकरण संस्कार में बच्चें का नाम रखा जाता है। 
चूडाकर्म: चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। मान्यता है कि मुंडन कराने से बालक का शरीर पूरी तरह से साफ हो जाता है और उसका बौद्धिक विकास पूर्ण रूप से हो पाता है। 

हिन्दू धर्म में ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को आदर्श बनाने के लिए ही संस्कारों की रचना की थी। इन्हीं संस्कारों के आधार पर परंपराएं बनी और पंरपराएं हिन्दू जीअन का एक अभिन्न अंग बन गई। 


इन संस्कारों और परंपराओं को विभिन्न कथाओं आदि के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाने का कार्य किया गया है। जैसे कृष्ण लीलाओं और राम लीला में विवाह, विद्यारंभ जैसे प्रसंगों को रोचक बनाकर दिखाया गया है ताकि लोग इनके बारें में समझ सकें। इसी तरह भारतीय संतों और आध्यात्मिक गुरुओं ने भी इन परंपराओं को जिंदा रखने में अहम भूमिका निभाई है। 

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