पर्व और त्यौहार

वर्ष 2017 में पितृ पक्ष  5 सितंबर से 19 सितंबर तक होंगे। इस दौरान पितरों का श्राद्ध किया जाता है। हिन्दू धर्म में मोक्ष की प्राप्ति के लिए पितरों का तर्पण और श्राद्ध करना बेहद आवश्यक माना गया है। वेदों में भी इसके बारे में वर्णन किया गया है। पितरों को श्राद्ध देने की एक विधि होती है जिसका पालन करना सभी के लिए अनिवार्य होता है। 

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार हर व्यक्ति की तीन पीड़ियों की आत्मायें पितृ-लोक में रहती हैं। यह माना जाता है की पितृ-लोक धरती और स्वर्ग के बीच में होता है। इस लोक का स्वामी मृत्यु के देवता यम हैं। यह मान्यता है की जब अगली पीडी के व्यक्ति की मृत्यु होती है तब पहली पीडी का व्यक्ति स्वर्ग जाता है जिससे वह ईश्वर के निकट आ जाता है। पितृ-लोक में निवास करने वालीं केवल पिछली तीन पीड़ियों के लिए ही श्राद्ध किया जाता है। 


हर साल कृष्णा पक्ष के समय श्राद्ध पक्ष आता है। 2017 में पितृ-पक्ष 16 दिन का है और नवरात्री 10 दिन की। यह बहुत ही दुर्लभ घटना है जो 427 वर्षो में एक बार होती है।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार महाभारत युग के समय जब कर्ण की मृत्यु हुई तोह उसकी आत्मा को स्वर्ग में सोना और हीरे दिए गए। परन्तु कर्ण को भोजन चाहिए था इसीलिए उसने स्वर्ग के देवता इंद्र से पुछा की उसको भोजन के लिए सोना क्यों दिया जा रहा है। तब इंद्र ने बताया की कर्ण ने जीवित रहते लोगों को सोना तो दान में दिया लेकिन कभी अपने पूर्वजों को श्राद्ध के समय भोजन का दान नहीं दिया। यह सुन कर कर्ण ने इंद्र से कहा की उसने श्राद्ध में भोजन दान इसलिए नहीं किया क्यूंकि उसको अपने पूर्वजों के बारे में कोई जानकारी थी ही नहीं। यह सुन कर कर्ण को अपनी गलती सुधरने का एक अवसर दिया गया। कर्ण को धरती पर 15 दिन के लिए जाने की अनुमति दी गयी ताकि वह श्राद्ध के अनुष्ठान पूरे कर सके और अपने पूर्वजों की याद में भोजन और जल का दान कर सके। इसी के बाद उन 15 दिनों के समय को पितृ पक्ष कहा गया।

श्राद्ध के उद्देश्य:

श्राद्ध का मुख्या उद्देश्य यह होता है की इससे हमारे पूर्वजों को पितृ-लोक से उपर जाने में सहायता मिलती है। पूर्वजों की इच्छाओं को श्राद्ध से पूरा करने से उनकी आत्मा को नकारात्मकता से बहार निकलने में सहायता मिलती है।​

श्राद्ध पूजा करने का महत्व:

पूर्वजों का क़र्ज़ चुकाना उतना ही आवश्यक है जीतना भगवन गुरु और समाज का क़र्ज़ चुकाना। यह वंशजों का दायित्व है की वह अपने पूर्वजों का सम्मान करें उनके नाम पर दान करें और वह हर कार्य करें जिससे उनके पूर्वजों को शांति मिले। पूर्वजों की आत्मा को शांति तभी मिलती है जब उनका पुत्र उनको पिण्ड और पानी प्रदान करता है। जो व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार श्राद्ध के अनुष्ठान निभाता है वह भगवान ब्रह्मा से लेकर घास के टुकड़े तक को संतुष्ट करता है। ​


श्राद्ध विधि (Shardha Vidhi in Hindi)
गरुड़ पुराण के अनुसार पिण्ड दान या तर्पण हमेशा एक सुयोग्य पंडित द्वारा ही कराना चाहिए। उचित मंत्रों और योग्य ब्राह्मण की देखरेख में किया गया श्राद्ध सर्वोत्तम होता है। इस दिन ब्राह्मणों और गरीबों को दान अवश्य करना चाहिए। साथ पशु-पक्षियों (विशेषकर गाय, कुत्ते या कौवे) को भोजन कराना चाहिए।
 
पितरों का श्राद्ध मृत्यु तिथि पर ही करना चाहिए लेकिन अगर यह ना मालूम हो तो आश्विन अमावस्या के दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग होता है, इस दिन को शुभ मानकर पितरों को श्राद्ध अर्पित करना चाहिए। 
 
पितरों का श्राद्ध अगर गया या गंगा नदी के किनारे किया जाए तो सर्वोत्तम होता है। ऐसा ना होने पर जातक घर पर भी श्राद्ध कर सकते हैं। पितृ पक्ष के दौरान जिस दिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि हो उस दिन व्रत करना चाहिए। इस दिन खीर और अन्य कई पकवान बनाने चाहिए। 
 
 दोपहर के समय पूजा शुरु करनी चाहिए। अग्निकुंड में अग्नि जलाकर या उपला जलाकर हवन करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण या योग्य पंडित की सहायता से मंत्रोच्चारण करने चाहिए। पूजा के बाद जल से तर्पण करना चाहिए। इसके बाद गाय, काले कुत्ते और कौए के लिए ग्रास (उनका हिस्सा) निकाल देना चाहिए। इन्हें भोजन देते समय अपने पितरों का ध्यान करना चाहिए और मन ही मन उनसे निवेदन करना चाहिए कि आप आएं और यह श्राद्ध ग्रहण करें। 
 
पशुओं को भोजन देने के बाद तिल, जौ, कुशा, तुलसी के पत्ते, मिठाई और अन्य पकवान ब्राह्मण को परोस कर उन्हें भोजन कराना चाहिए। भोज कराने के बाद ब्राह्मण को दान अवश्य देना चाहिए। 


 मान्यता है कि जो व्यक्ति नियमपूर्वक श्राद्ध करता है वह पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है। पितृ श्राद्ध पक्ष में किए गए दान और श्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं और जातक को सदैव स्वस्थ, समृद्ध और खुशहाल  होने का आशीर्वाद देते हैं। 

हमारे पूर्वज किसी भी रूप में हो सकते हैं इसीलिए हमें उनको उनके लिए गए रूप के अनुसार भोजन देना होता है। धरती के अलावा और किसी क्षेत्र में भोजन उपलब्ध नहीं होता है। महालय श्राद्ध के अनुष्ठान में वासु रूद्र और आदित्य मृत पूर्वजों के देवता माने जाते है। वासु का अर्थ इच्छा होती है रूद्र का अर्थ विघटन होता है और आदित्य का अर्थ पूर्ण अग्नि सिधांत और कार्य होता है। इन तीन देवताओं को पूजने से पिता दादा और पड़ दादा को मुक्ति प्रदान की जा सकती है।    

महालय अमावस्या श्राद्ध के दिनों में सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस श्राद्ध के अनुष्ठान को बिना तिथि या नक्षत्र को देखे किया जा सकता है। इस श्राद्ध को सर्व पितृ श्राद्ध भी कहते है। ब्राह्मण संतार्पना के अनुष्ठान को इस दिन किया जाता है। ऐसा करने से हमारे पूर्वजों को शांति मिलती है। इस अनुष्ठान को करने से हमारे पूर्वजों को उनके द्वारा किये गए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध के समय क्या करें और क्या ना करें।

श्राद्ध की पूजा और खाना बनाने की लिए केवल गाय का दूध, और उससे बना दही और घी का प्रयोग करें। जिस गाय के अभी किसी बछड़े को जन्म दिया हो उसके दूध का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

कोशिश करें की खाना चाँदी के बर्तन में परोसा जाये। श्राद्ध के समय चाँदी के बर्तनों का प्रयोग शुभ माना गया है। यह मान्यता है की चाँदी बुरी शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करती है। चाँदी के इलावा ताम्बे और पीतल के बर्तनों को भी शुभ माना जाता है।

जों के बीज और सरसों का इस्तेमाल करें। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पूजा के लिए जों कांगनी और सरसों का इस्तेमाल शुभ होता है।

तिल: खाने की सामग्री में तिल भी बहुत शुभ माना गया है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार तिल न सिर्फ बुरी शक्तियों से सुरक्षा देता है बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में अच्छा भाग्य भी लाता है।

खीर: खीर को दूध दही घी और शहद से बनाया जाता है। खीर को पुजारी को भी दिया जाता है। खीर हिन्दू अनुष्ठानों की अनिवार्य मिष्ठान है।

श्राद्ध पूजा और दान में मॉस अंडे और ख़राब फलों या गेहूं का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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